सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर दोहरी मार! बढ़ती लागत, कमजोर मांग और मजदूरों के पलायन से कारोबार पर दबाव

SHARE:

सूरत, गुजरात | 13 अक्टूबर 2026

देश के प्रमुख कपड़ा उत्पादन केंद्रों में शामिल सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री इन दिनों कई चुनौतियों से जूझ रही है। धागे की बढ़ती कीमतें, बिजली और उत्पादन खर्च में इजाफा, कमजोर बाजार मांग तथा मजदूरों से जुड़े विवादों ने कपड़ा कारोबारियों की चिंता बढ़ा दी है। वहीं, प्रवासी श्रमिकों के अपने गांव लौटने की खबरों से फैक्ट्रियों में कामकाज और उत्पादन को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

 

धागे की कीमतों में बढ़ोतरी से कारोबारियों की परेशानी

 

6 अक्टूबर को प्रकाशित अहमदाबाद मिरर की रिपोर्ट के मुताबिक, सूरत में पॉलिएस्टर धागे की कीमत लगभग 20 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़ी। कोयले, बिजली, रंगाई और रसायनों की लागत में वृद्धि ने भी कपड़ा उत्पादन को महंगा किया है। कारोबारियों के सामने चुनौती यह है कि बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ ग्राहकों पर डालना आसान नहीं है, खासकर जब बाजार में मांग कमजोर हो।

मजदूरों के पलायन से उत्पादन पर असर की आशंका

 

9 अक्टूबर की रिपोर्टों के अनुसार, दिवाली से पहले सूरत के कपड़ा और कढ़ाई उद्योग में प्रवासी मजदूरों के गांव लौटने का सिलसिला शुरू हुआ। श्रमिक प्रतिनिधियों ने कामकाजी परिस्थितियों और श्रम नियमों के पालन को लेकर चिंता जताई है।

 

मजदूर आठ घंटे की ड्यूटी, साप्ताहिक छुट्टी और बेहतर कामकाजी व्यवस्था की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर, उद्योग से जुड़े कुछ संगठनों का कहना है कि इन व्यवस्थाओं को लागू करने से कर्मचारियों की जरूरत और परिचालन लागत बढ़ सकती है।

 

इस विवाद का समाधान नहीं निकलने पर कपड़ा इकाइयों के संचालन और उत्पादन क्षमता पर दबाव बढ़ने की आशंका है।

 

क्या बंद होने की कगार पर हैं कपड़ा मिलें?

 

फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि सूरत की पूरी टेक्सटाइल इंडस्ट्री बंद होने की कगार पर है। हालांकि, बढ़ती लागत, कमजोर मांग और श्रमिकों की उपलब्धता से जुड़ी समस्याएं उद्योग के सामने गंभीर चुनौतियां जरूर खड़ी कर रही हैं।

 

क्या बंगाल की पुरानी चटकल मिलों जैसा संकट दोहराया जा सकता है?

 

पश्चिम बंगाल की ऐतिहासिक जूट मिलों में लंबे समय तक श्रम विवाद, वित्तीय कठिनाइयों और उत्पादन संबंधी समस्याओं का असर देखा गया है। सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री की मौजूदा स्थिति को लेकर ऐसी तुलना की जा रही है, लेकिन दोनों उद्योगों की संरचना और आर्थिक परिस्थितियां अलग हैं।

 

इसलिए सूरत में बंगाल की चटकल मिलों जैसा संकट आने की आशंका को अभी एक सवाल के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि स्थापित तथ्य के रूप में।

 

आगे क्या होगा?

 

सूरत के कपड़ा उद्योग का भविष्य काफी हद तक धागे की कीमतों, बाजार की मांग, श्रम विवादों के समाधान और उत्पादन लागत पर निर्भर करेगा। कारोबारियों और श्रमिक प्रतिनिधियों के बीच सहमति बनने से कामकाज को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है।

 

News Mantra24x7 का सवाल: क्या बढ़ती लागत और मजदूरों की समस्याएं देश के प्रमुख कपड़ा केंद्र सूरत के कारोबार को लंबे समय तक प्रभावित करेंगी?

 

News Mantra24x7 | देश-दुनिया की प्रमुख खबरे

सबसे ज्यादा पढ़ी गई

Weather

राज्य

शहर चुनें