कुड़माली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग, अमित शाह से मिला प्रतिनिधिमंडल।

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नई दिल्ली/झारखंड :- कुड़माली भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई है। इस मांग को लेकर सांसद ज्योतिर्मय सिंह महतो (पुरुलिया), सांसद चंद्र प्रकाश चौधरी (गिरिडीह) और राज्यसभा सांसद खीरू महतो ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर मांग-पत्र सौंपा।

प्रतिनिधिमंडल ने गृह मंत्री को बताया कि कुड़माली केवल एक भाषा नहीं, बल्कि लाखों लोगों की सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषायी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, बांकुड़ा, झाड़ग्राम और पश्चिम मेदिनीपुर समेत जंगलमहल क्षेत्र के अलावा झारखंड के रांची, रामगढ़, बोकारो, धनबाद, हजारीबाग, गिरिडीह, जमशेदपुर और सरायकेला-खरसावां तथा ओडिशा के मयूरभंज, क्योंझर और सुंदरगढ़ सहित कई क्षेत्रों में कुड़माली बोली और समझी जाती है।

प्रतिनिधिमंडल ने कुड़माली की समृद्ध लोक-साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा का भी उल्लेख किया। कुड़माली भाषा का लोकगीत, लोककथा, कविता और मौखिक परंपराओं से गहरा जुड़ाव है। झुमर, टुसू, करम और छऊ जैसी लोक-सांस्कृतिक परंपराओं के साथ भी इसका महत्वपूर्ण संबंध बताया गया।

प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि कुड़माली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने से भाषा और साहित्य के संरक्षण एवं विकास को प्रोत्साहन मिलेगा। इसके साथ ही शैक्षणिक और अनुसंधान कार्यों को बढ़ावा मिलने तथा कुड़माली भाषी समाज की सांस्कृतिक पहचान को संस्थागत सम्मान मिलने की उम्मीद है।

मुलाकात के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रतिनिधिमंडल की मांग को गंभीरता से सुना। प्रतिनिधिमंडल के अनुसार, गृह मंत्री ने इसे जायज और व्यापक जनहित से जुड़ा विषय बताया तथा भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य के संरक्षण एवं विकास के प्रति केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता व्यक्त की।

प्रतिनिधिमंडल ने गृह मंत्री के आश्वासन को कुड़माली भाषी समाज की लंबे समय से चली आ रही मांग की दिशा में सकारात्मक कदम बताया। नेताओं ने कहा कि कुड़माली भाषा को संवैधानिक सम्मान दिलाने का प्रयास आगे भी जारी रहेगा।

कुड़माली भाषा की संवैधानिक मान्यता की मांग अब एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर उठी है। समर्थकों का कहना है कि भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करना केवल भाषायी सम्मान नहीं, बल्कि कुड़माली समाज की संस्कृति, परंपरा और विरासत के संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम होगा।

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